माँ इस धरती में स्वर्ग उतार लाती है। मां दुख और विषाद के पलों में हृदय को सींचती है। इसलिए जल, धन, गांव, राष्ट्, सरस्वती, बुद्धि को मां के रूप में अभिहित किया गया है।
डॉ. सीमा रानी प्रधान
विभागाध्यक्ष हिंदी
डॉ राधाबाई शासकीय नवीन कन्या महाविद्यालय रायपुर
अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर उन सभी महिलाओं को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं जिन्होंने अपने स्तर पर स्त्रीत्व को सम्मानित किया है। उन सभी महिलाओं को हार्दिक बधाई जिन्होंने बनी बनाई परिपाटी से अलग जाकर एक नई दुनिया बनाई। उन सभी महिलाओं को भी बधाई जिन्होंने घर समाज और देश को बनाने के लिए अपने आप को लगा दिया। वो महिलाएँ भी बधाई के पात्र हैं, जिन्होंने अपने परिजनों को खड़ा करने के लिए अपने सपनों को अपने अंदर दफना दिए।उन सभी महिलाओं को भी बधाई जिन्होंने अपने सपनों को एक नई उड़ान दी। नए संभावनाओं के द्वार खोले।जलते-बुझते मन में नई उम्मीद जगाई।
अभी हाल ही में यूपीएससी का रिजल्ट आया है, जिसमें दृष्टिबाधित रवि की शानदार सफलता चर्चा का विषय है। उनके पीछे उनकी मां का अदम्य साहस और दृढ़ निश्चय है। उनकी माता स्वयं विषय को पढ़कर उन्हें सुनाती थी और इस प्रकार अपने बेटे को इस मुकाम तक पहुंचा दिया। अपने बेटे के अंधत्व को रोशनी बनाया। ऐसी मां योद्धा से कम नहीं होती। उन सभी महिलाएं जिन्होंने अपनी संतान को देश के लिए समर्पित किया। बुढ़ापे में एकांत चुन ली लेकिन देश को सबसे ऊपर रखा। उन महिलाओं को महिला दिवस पर सादर नमन। उन सभी महिलाओं को हृदय से बधाई जिन्होंने किसी न किसी सृजन कार्य में रत रहकर समाज को प्रगतिशील बनाया है। महिला दिवस मनाने का उद्देश्य भी यही है कि उन महिलाओं को सम्मानित करना जिन्होंने स्वयं की श्रेष्ठता को समाज के सामने सिद्ध किया है। जो सदैव स्त्री के सम्मान के पक्ष में खड़ी रही। स्त्रियों की क्षमताओं को उजागर किया है। उनके काम को सम्मान दिलाने में संघर्ष की है। यह विडम्बना है स्त्रियों को सामान्य इंसान के रूप में स्थापित करने के लिए एक लंबा संघर्ष करना पड़ा।

भारतीय समाज में प्राचीन काल से ही स्त्री का स्थान हमेशा ऊंचा रहा है। भगवान श्री कृष्ण युधिष्ठिर से भविष्य पुराण में कहते हैं “यत्र नार्यस्तु पूज्यंते, रमंते तत्र देवता। ”इस श्लोक में पूजा से तात्पर्य दीप, धूप, चंदन, रोली से स्त्री की पूजा नहीं है यहां पूजा से तात्पर्य है स्त्री को इतना सम्मानित एवं पूजनीय स्तर तक पहुंचाने हेतु अवसर प्रदान करना। इसमें स्त्री और पुरुष में किसी प्रकार की तुलना भी नहीं की गई है और ना ही कम या श्रेष्ठ समझने का भाव है।यह सत्य है कि स्त्री के पास पुरुष जैसे मांसपेशियों की शक्ति नहीं है, लेकिन प्रकृति ने उसे पुरुषों से कहीं ज्यादा क्षमतावान और सहनशील बनाया है।कुछ बातें तो सिर्फ स्त्री में ही समाहित है -जैसे उनमें मातृत्व की शक्ति है।स्त्री 9 महीने तक संतान को गर्भ में धारण कर सकती है। घर की संपूर्ण जिम्मेदारियां एक साथ निभा सकती है। स्त्री और पुरुष की बुद्धि लब्धि बराबर है लेकिन स्त्री की भावुकता पुरुष से कहीं अधिक है। स्त्री एक साथ कई प्रकार के कार्य कर सकती है।इसलिए उन्हें अष्टभुजा दुर्गा के रूप में जाना जाता है। स्त्री कई लोगों से एक साथ बातचीत कर सकती है जैसे कामवाली बाई से, दूध वाले से, घर के सदस्यों से, सब्जी वाले से एवं साथ ही पूजा पाठ की व्यवस्था, पड़ोसी, किचन सबको एक साथ एक ही समय में संभालते रहती है। स्त्री अपने कार्य के कारण पूजनीय है। वह सृजनकर्ता, संहार कर्ता, विधि कर्ता, प्रथम गुरु, के रूप में कार्य करती है। प्रबंधक के रूप में स्त्री की श्रेष्ठ पहचान है। कोमलांगी स्त्री कठोर मेहनती भी है। उसके अंदर विविध भाव और गुण एक साथ चलते हैं।स्त्री दिल खोलकर बात कर सकती है। जितना वह बात करती है उतना ही उसे सुनने की धैर्य भी रखती है। वह अपने सखी सहेलियां, परिजनों की बातों को बहुत धैर्य से सुन सकती है। वह विद्रोही भी होती है उसके मन की विपरीत उसे कोई कार्य कराया नहीं जा सकता। इतिहास गवाह है वह स्वभाव से मुखर होती है, लेकिन जब वह मौन होती है तो अपने सभी रूपों से ज्यादा शक्तिशाली हो जाती है।
स्त्री हमेशा पिता, भाई, पुत्र के संरक्षण में रहना चाहती है। लेकिन ऐसे कई उदाहरण है जिसमें स्त्रियों ने अकेले ही अपने संतान को पालन कर उसे श्रेष्ठता प्रदान की है। क्राइस्ट, भरत, शिवाजी, नानक, निमाई, गोविंद चंद्र, विवेकानंद, गौतम, प्रह्लाद, सालबेग, जैसे विभूतियों का निर्माण उनकी माताओं ने किया है।स्त्री जब अकेली होती है और भी मजबूती के साथ खुद को समाज के साथ तादात्म्य स्थापित करती है।

वर्तमान में स्त्री सशक्तिकरण को लेकर कई प्रकार के भ्रम समाज में फैली हुई है। यह दुविधा है कि किसे सशक्त स्त्री माने। सच्चे अर्थों में स्त्री शक्तिकरण का तात्पर्य स्त्री के निर्णय लेने की क्षमता से है, यदि स्त्री स्वयं अपनी, संतान और अपने भविष्य के लिए स्वयं निर्णय लेने के लिए सक्षम है और जिस परिवार से समाज में वह रहती है उसे वहां निर्णय में उसे भागीदारी बनाया जा रहा है तो वह स्त्री सशक्त है।सशक्तिकरण और नारीवाद में हमेशा ही विरोधाभास रहा है नारीवाद आजकल मुहावरे के जैसे प्रयोग हो रहा है। जबकि नारीवाद एक जीवन दर्शन है। लोकतंत्र का विस्तार है एवं समाज का समता मूलक स्वरूप है।नारीवाद आज एक हथियार के रूप में प्रयोग हो रहा है नारीवाद का उपयोग पुरुषों से ज्यादा स्त्रियां कर रही हैं, यह दुर्भाग्यपूर्ण है। स्त्री द्वारा पुरुषों का शोषण या पुरुषों पर आश्रित होना ही एक तरह से नारीवाद का दुरुपयोग है। नारीवाद सही अर्थ में यह है कि नारी को पुरुषों के जैसे ही एक संपूर्ण इंसान माना जाए। स्त्रियों को वे सारे अधिकार मिल सके जो पुरुषों तक सीमित है।
भारतीय समाज में स्त्री महालक्ष्मी के रूप में अधिष्ठित है। स्त्री लक्ष्मी के संपूर्ण रूप आद्य, विद्या, सौभाग्य, काम, अमृत, भोग, योग और सत्य के रूप में समाज की आधारशिला है। स्त्री के भीतर आंतरिक वैभव की विपुल संपदा है। इस सबसे महत्वपूर्ण है स्त्री का त्याग। स्त्री के त्याग से श्रद्धा उत्पन्न होती है, श्रद्धा से विश्वास गहरा होता है, जो प्रेम को चिरस्थाई करता है। यही प्रेम मातृत्व को आधार प्रदान करता है।
मां औरत का सबसे श्रेष्ठ रूप और चरम विकास है। मां मनुष्य में देवत्व का उदय करती है। इस धरती में स्वर्ग उतार लाती है। मां दुख और विषाद के पलों में हृदय को सींचती है। इसलिए जल, धन, गांव, राष्ट्, सरस्वती, बुद्धि को मां के रूप में अभिहित किया गया है।
प्राचीन काल में भारत में मां सदैव उच्च स्थान में सुशोभित रही। हमारी संस्कृति स्त्रियों की मातृत्व से सदैव भय खाती है और उसे वात्सल्य भाव से ही जीतने का साहस कर पाती है, अन्यथा उसके प्रखर व प्रचंड वेग के आगे तूफान भी टिक नहीं पाते हैं।
सभी महिलाओं को अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की पुन: शुभकामनाओं के साथ।










