अंजिनेश अंजय शुक्ला
उच्च न्यायालय अधिवक्ता छत्तीसगढ़

भूमिका: भारतीय विधि-प्रणाली की आत्मा केवल विधियों में नहीं, बल्कि न्यायिक निर्णयों में निहित है। भारत में precedent (न्यायिक दृष्टांत) कानून का एक महत्वपूर्ण स्रोत है। ऐसे में जब कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसी तकनीक न्याय, प्रशासन और शासन में प्रवेश कर रही है, तब उसका मूल्यांकन केवल सैद्धांतिक नहीं, बल्कि न्यायिक व्याख्याओं के आलोक में किया जाना अनिवार्य हो जाता है।
यह अध्ययन इस प्रश्नन का उत्तर खोजने का प्रयास करता है कि क्या कृत्रिम बुद्धिमत्ता भारतीय संवैधानिक ढाँचे,
प्राकृतिक न्याय और न्यायिक विवेक के साथ संगत है।
अनुच्छेद 14 और एआई –
समानता बनाम एल्गोरिदमिक पक्षपात
E.P. Royappa v. State of Tamil Nadu (1974)
सर्वोच्च न्यायालय ने कहा:
“Article 14 strikes at arbitrariness in State action.”
यदि राज्य एआई आधारित निर्णय प्रणाली अपनाता है और वह प्रणाली:
अपारदर्शी है,
पूर्वाग्रही डेटा पर आधारित है,
तो ऐसा निर्णय मनमाना (Arbitrary) माना जाएगा और अनुच्छेद 14 का उल्लंघन होगा।
अनुच्छेद 21, प्राकृतिक न्याय और एआई
A.K. Kraipak v. Union of India (1969)
न्यायालय ने कहा कि प्राकृतिक न्याय प्रशासनिक निर्णयों पर भी लागू होता है।
प्राकृतिक न्याय के दो प्रमुख सिद्धांत हैं:
Audi Alteram Partem (दूसरे पक्ष को सुनना)
Nemo Judex in Causa Sua (कोई अपने ही मामले में
न्यायाधीश नहीं)
एआई न तो किसी को “सुन” सकती है और न ही नैतिक निष्पक्षता समझ सकती है।
Mohinder Singh Gill v. Chief Election Commissioner (1978)
निर्णय का आधार वही होगा जो निर्णय के समय दर्ज किया गया हो।
यदि एआई:
निर्णय का तर्क समझाने में असमर्थ है,
या बाद में तर्क “जनरेट” करता है,
तो यह निर्णय अवैध होगा।
अध्याय 4 : निजता का अधिकार, डेटा और एआई
Justice K.S. Puttaswamy v. Union of India (2017)
निजता को मौलिक अधिकार घोषित किया गया।
न्यायालय ने कहा:
•n डेटा संग्रह आवश्यक, आनुपातिक और वैध उद्देश्य के लिए होना चाहिए।

एआई आधारित शासन में:
बड़े पैमाने पर डेटा प्रोसेसिंग होती है,
प्रोफाइलिंग और सर्विलांस की संभावना बढ़ती है।
बिना सशक्त डेटा संरक्षण कानून के, एआई अनुच्छेद 21 का उल्लंघन कर सकती है।
Anuradha Bhasin v. Union of India (2020)
न्यायालय ने आनुपातिकता (Proportionality) सिद्धांत लागू किया। यदि एआई:
नागरिक स्वतंत्रता पर अत्यधिक नियंत्रण लगाए,
बिना पारदर्शिता के कार्य करे,
तो वह असंवैधानिक होगी।
आपराधिक न्याय प्रणाली और एआई
State of Rajasthan v. Kashi Ram (2006)
सुप्रीम कोर्ट ने कहा:
“Suspicion, however strong, cannot take the place of proof.”
यदि एआई:
अपराध की भविष्यवाणी (Predictive Policing) करे,
केवल संभावनाओं के आधार पर व्यक्ति को संदिग्ध ठहराए,
तो यह आपराधिक न्याय के मूल सिद्धांत के विरुद्ध होगा।
Bachan Singh v. State of Punjab (1980)
न्यायालय ने कहा कि सजा निर्धारण में मानवीय विवेक और परिस्थितियों का महत्व है।
• एआई न तो पश्चाताप, न सुधार की संभावना, न सामाजिक पृष्ठभूमि को समझ सकती है।
प्रशासनिक कानून, उत्तरदायित्व और एआई
A.K. Gopalan v. State of Madras (1950) (परवर्ती व्याख्याओं सहित)
राज्य को प्रत्येक निर्णय के लिए उत्तरदायी ठहराया गया।

यदि एआई गलत निर्णय ले:
उत्तरदायित्व किसका होगा?
प्रोग्रामर, अधिकारी या राज्य?
Doctrine of Accountability एआई के साथ कमजोर पड़ती है।
निष्कर्ष :
उपरोक्त केस-लॉ विश्लेषण से यह स्पष्ट है कि:
1. भारतीय संविधान मानव-केंद्रित न्याय की अवधारणा पर आधारित है
2. कृत्रिम बुद्धिमत्ता:
समानता,
निजता,
प्राकृतिक न्याय,
न्यायिक विवेक
के लिए गंभीर चुनौतियाँ प्रस्तुत करती है
3. बिना सशक्त विधायी ढाँचे के एआई का प्रयोग असंवैधानिक सिद्ध हो सकता है
अंतिम निष्कर्ष
कृत्रिम बुद्धिमत्ता भारतीय विधि-प्रणाली में सहायक उपकरण हो सकती है, परंतु निर्णयकर्ता नहीं।
संविधान, न्यायिक दृष्टांत और मानवीय गरिमा—तीनों के अधीन रहकर ही इसका सीमित उपयोग स्वीकार्य है।
“Technology may inform justice,
but it can never replace conscience.”









