
मैंने पत्रकारिता के अनुभवों को साहित्य में पिरोया, और साहित्य के कारण मेरी पत्रकारिता में निखार आया. साहित्य की भाषा का इस्तेमाल मैंने पत्रकारिता में किया.

गिरीश पंकज
व्यंग्यकार एवं साहित्यकार
संपादक / प्रकाशक
सदभावना दर्पण
रायपुर, छत्तीसगढ़
व्यंग्यकार एवं साहित्यकार गिरीश पंकज से ️विनय वास्तव की विशेष बातचीत
आपका जन्म बनारस में हुआ, लेकिन आपकी शिक्षा और व्यक्तित्व का निर्माण छत्तीसगढ़ की मिट्टी में हुआ। यदि आज आपको अपने बचपन के उस छोटे से गिरीश से मिलने का अवसर मिले, तो आप उसे कौन-सी ऐसी बात कहेंगे जो जीवन भर उसका संबल बन जाए?
जीवन की कठिन डगर में निरंतर चलते ही जाना. निराश-हताश होने की आवश्यकता नहीं. अभावों के बीच भी एक न एक दिन उपलब्धियों का सुमन खिलता ही है. यह भी संदेश दूँगा कि समय मिले तो घुड़सवारी करो, फुटबॉल खेलो, क्रिकेट खेलो, गिल्ली डंडा भी. खूब तैराकी करो.

आपने पत्रकारिता और साहित्य—दो ऐसी धाराओं में समान रूप से काम किया, जहाँ एक सच को दर्ज करता है और दूसरा उसे संवेदना देता है। आपके भीतर पत्रकार पहले जन्मा या साहित्यकार? और क्या कभी इन दोनों के बीच वैचारिक टकराव भी हुआ?
पहले साहित्यकार का जन्म हुआ, जिसने पत्रकारिता की राह दिखाई. दोनों में टकराव की नौबत इसलिए नहीं आई कि मैंने साहित्य और पत्रकारिता को एक ही सिक्के के दो पहलुओं के रूप में देखा. मैं अपने आप को उस परंपरा का पथिक मानता हूँ, जिस परंपरा में साहित्य और पत्रकारिता समान रूप से चलने वाले सहयात्री रहे हैं. मैंने पत्रकारिता के अनुभवों को साहित्य में पिरोया, और साहित्य के कारण मेरी पत्रकारिता में निखार आया. साहित्य की भाषा का इस्तेमाल मैंने पत्रकारिता में किया.
आपके व्यंग्य पर अब तक अनेक शोध हो चुके हैं। क्या आपको कभी ऐसा लगा कि समाज को हँसाने के लिए लिखते-लिखते आपने भीतर ही भीतर बहुत-सा दर्द अपने पास ही रोक लिया?
जो सही लेखक होता है, वह अपनी पीड़ा को लोक-पीड़ा में तब्दील कर देता है. व्यष्टि से समष्टि की यात्रा ही साहित्य की यात्रा है. अपने भीतर का दर्द छुपा कर समाज के दर्द को रूपायित करना ही साहित्य है.साहित्य अगर आत्मरति का शिकार हो जाएगा, तो वह लोकमंगल नहीं कर सकता. लोक कल्याण के लिए अपने दर्द को छुपाना और दुनिया के दर्द को रचना के माध्यम से अभिव्यक्त करना ही सच्चे रचनाकार का परम् कर्तव्य होता है.
आपकी 115 से अधिक पुस्तकें और हजारों पृष्ठों की रचनावली केवल लेखन नहीं, बल्कि एक युग का दस्तावेज़ हैं। इतनी विपुल सृजन-यात्रा के बाद भी क्या कोई ऐसी अधूरी किताब, अधूरा सपना या अनकहा विचार है, जो आज भी आपको बेचैन करता है?
सच कहूँ, तो मुझे लगता है कि अभी मैंने कुछ लिखा ही नहीं है. मैं अभी उस एक रचना की तलाश में सृजन रत हूँ, जो मुझे परम् संतुष्टि देगी, जिसे रचने के बाद मैं कह सकूँ कि यह मेरा पूर्ण विराम है. अभी तो निरंतर अल्पविराम ही जारी है. मतलब जब तक सांस है, तब तक लेखन जारी रहेगा. इस अधूरी किताब अधूरे सपने या अनकहे विचार की तलाश में हूँ,जो मेरी पूर्णाहुति बनेगी.

आज के समय में जब साहित्य से अधिक ‘प्रचार’ और लेखक से अधिक ‘ब्रांड’ की चर्चा होती है, तब आप युवा लेखकों को क्या सलाह देंगे—पहले अच्छा लेखक बनें या पहले प्रसिद्ध लेखक?
मुझे किसी भी युवा लेखक को पहले अच्छा लेखक बनना चाहिए. धीरे-धीरे वह प्रसिद्ध लेखक भी बनेगा.हालांकि अभी उल्टी गंगा बह रही है. फूहड़ किस्म के अनेक लेखक भी इस समय प्रसिद्ध लेखक बने हुए हैं. इरॉटिक लेखन, सेक्स प्रधान लेखन भूतों को प्रसिद्ध लेखक बना रहा है. ऐसे लेखन से व्यक्ति का भला तो हो सकता है लेकिन साहित्य और समाज का भला कदापि नहीं हो सकता. लेखक को ब्रांड नहीं बाँड बनना है. यानी खुद से करार करना है कि उसे बेहतर लिखना है. उसी रास्ते पर चलना है, जिस रास्ते पर उसके पूर्वज पुरोधा साहित्यकार चलते रहे हैं.
आपने तेरह देशों की साहित्यिक यात्राएँ कीं और विश्व हिंदी सम्मेलनों में भारत का प्रतिनिधित्व किया। विदेशों में हिंदी के सम्मान को देखकर आपको सबसे अधिक गर्व कब हुआ और सबसे अधिक चिंता कब हुई?
विदेश प्रवास के दौरान सबसे ज्यादा गर्व मुझे उन देशों के मूल निवासियों द्वारा हिंदी में बात करते देखकर हुआ. पहली बार जब मरीज मॉरीशस गया तो वहां भारत की संस्कृति और हिंदी को पुष्पित पल्लवित होते देखकर बहुत खुशी हुई. वहां के अनेक लोग बड़े चाव से हिंदी में बात करते थे लेकिन अपने घर में वे भोजपुरी या अवधि में बात करके अपनी लोक भाषा को जिंदा रखते थे. लेकिन एक अंतराल के बाद दोबारा जब गया, तो मेरी चिंता बढ़ गई क्योंकि वहां अब हिंदी संस्कृति काफी कम नजर आ रही थी. यह दृश्य मेरे लिए बेहद पीड़ाजनक था. विदेश प्रवास के दौरान वहां के अनेक भारतीयों को देखकर मुझे संतोष इसलिए भी हुआ कि वे लोग भारत को भूले नहीं हैं. समय-समय पर भारतीय त्योहारों को खुशी-खुशी मनाते हैं और हमेशा अपने देश को याद करते रहते हैं.

इतने सम्मान, पुरस्कार और राष्ट्रीय पहचान प्राप्त करने के बाद भी क्या आज भी कोई ऐसा सम्मान है जिसकी प्रतीक्षा आपको नहीं, बल्कि आपके पाठकों को है?
यह बहुत सुंदर प्रश्न है. मुझे किसी सम्मान की व्यग्रता के साथ प्रतीक्षा नहीं है. वैसे अक्सर लोग मुझसे पूछते हैं कि आपको पद्मश्री तो मिल गई होगी. जब मैं कहता हूँ, नहीं मिली, तब लोग कहते हैं, आपको मिलनी चाहिए. इसके लिए आप प्रयास करें. लोगों से मिलें. छत्तीसगढ़ सरकार का एक सम्मान है इसके बारे में भी लोग कहते हैं कि आपको बहुत पहले मिल जाना चाहिए था.लोग यह भी कहते हैं, साहित्य अकादमी भी मिलना चाहिए. तो मैं कहता हूं कि बिना किसी प्रयास के बिना किसी जोड़-तोड़ के सम्मान मिले, तो उसका सुख ज्यादा है. अगर सम्मानों के पीछे भाग कर कोई सम्मान मिले, तो यह मेरे लिए आत्मग्लानि से भरने वाला प्रसंग होगा.
आपके लेखन में व्यंग्य है, करुणा है, लोकजीवन है और राष्ट्रचिंतन भी। यह दृष्टि आपको पुस्तकों से मिली, समाज से मिली या माता-पिता के संस्कारों से?
राष्ट्र चिंतन की भावना मुझे माता-पिता से पहले मिली, फिर पुस्तकों से मिली. उन साहित्यकारों से मिली, जिन्होंने परतंत्र भारत के समय राष्ट्र प्रेम की रचनाएँ रचा करते थे, जिनमें कुछ नाम मैं ले सकता हूँ, जैसे गयाप्रसाद शुक्ल सनेही, रामनरेश त्रिपाठी, माखनलाल चतुर्वेदी मैथिलीशरण गुप्त, रामधारी सिंह दिनकर, श्यामलाल पार्षद आदि, जिनकी रचनाएं पढ़ कर अंतर मन में देश प्रेम का ज्वार उमड़ा. भारतेंदु हरिश्चंद्र की परंपरा में बहुत बाद में जो व्यंग्य रचा गया, उसे पढ़कर भी मेरे भीतर व्यंग्य के संस्कार विकसित हुए.हरिशंकर परसाई और शरद जोशी आदि को पढ़ते हुए मेरे व्यंग्यकार ने काफी हद तक आकार लेना शुरू किया.

आपने रिपोर्टर से लेकर संपादक तक का लंबा सफर तय किया। इस यात्रा में कोई ऐसी घटना, कोई ऐसा व्यक्ति या कोई ऐसा निर्णय, जिसने आपके जीवन की दिशा ही बदल दी हो?
अनेक घटनाएं मेरे जीवन में ऐसी आई जिसने मेरे व्यक्तित्व को और मजबूत किया. मैंने स्टिंग ऑपरेशन करके पुरस्कार पाने वाली रिपोर्टिंग की, बिना रिश्वतखोरी किए चुनाव की रिपोर्टिंग की. पत्रकारिता की यात्रा का रोचक पड़ाव यह है कि मैंने जब पत्रकारिता शुरू की, तब पत्रकारिता का ‘प’ भी मुझे नहीं पता था,लेकिन साहित्य का विद्यार्थी होने के कारण मेरी राह काफी आसान हो गई.फिर पत्रकारिता की दुनिया में कदम रखते साथ ही एक महीने के भीतर मुझे सर्वश्रेष्ठ संवाददाता का पुरस्कार भी मिला. मुझे हृदयानंद दुबे नामक पत्रकार ने खोज कर ‘बिलासपुर टाइम्स’ नामक अखबार का संवाददाता बनाया था. कह सकते हैं उन्हीं महानुभाव के कारण मेरे जीवन की दिशा बदली और मैं पत्रकारिता की दुनिया में सक्रिय हो गया.
आपने बच्चों के लिए भी साहित्य लिखा और गंभीर व्यंग्य भी। एक लेखक के रूप में बच्चों के लिए लिखना अधिक कठिन है या बड़ों के लिए? और क्यों?
बच्चों के लिए लिखना ज्यादा कठिन है, क्योंकि उसे वक्त हमें एक बच्चे में रूपांतरित होना पड़ता है. बाल मन की भाषा,बाल मन के चिंतन कुछ समझना पड़ता है शब्दों का चयन सावधानी के साथ करना पड़ता है ऐसा कोई कठिन शब्द न आ जाए जिसे बच्चा समझ न सके. इसके लिए पर्यायवाची शब्द खोजना पड़ता है. बहुत-सी बाल कहानियों में मैंने अनेक कठिन शब्द देखें हैं,जो बच्चों की समझ से परे होते हैं. बाल साहित्य लिखते वक्त मुझे बहुत सावधान रहना पड़ता है. लेकिन बड़ों के लिए लिखते वक्त उतनी सावधानी शब्दों के चयन को लेकर नहीं रखनी पड़ती. समझदार बड़े पाठक लगभग हर प्रचलित शब्दों का अर्थ जानते हैं. वैसे सच कहूँ,तो बच्चों के लिए लिखना मुझे सर्वाधिक सुखद लगता है. क्योंकि अपने प्रारंभिक लेखन की शुरुआत मैंने बाल साहित्य से ही की थी.
यदि आपको अपने जीवन की पूरी यात्रा को केवल तीन शब्दों में व्यक्त करना हो, तो वे तीन शब्द क्या होंगे? और उन तीन शब्दों के पीछे कौन-सी सबसे बड़ी कहानी छिपी है?
संघर्ष, शुचिता और धैर्य. यह तीन शब्द ही मेरे जीवन के आधार रहे. इसके पीछे सबसे बड़ी कहानी गांधीवादी पिताजी के संस्कार रहे. जिन्होंने हर समय मुझे नेक राह पर चलने का संदेश दिया. अपने कर्म से भी उन्होंने राह दिखाई.
आज का समाज असहिष्णुता, डिजिटल शोर और त्वरित प्रतिक्रियाओं के दौर से गुजर रहा है। ऐसे समय में क्या व्यंग्य अब भी समाज को बदलने की शक्ति रखता है, या वह केवल मनोरंजन तक सीमित होता जा रहा है?
कोई भी रचना अगर लोकमंगल, लोक कल्याण, लोक जागरण के लिए लिखी गई है, तो उसे पढ़कर सुधी पाठक जरूर विचार करेगा, और अपने जीवन में सुधार करने की कोशिश करेगा. व्यंग्य आईना दिखाने का काम करता है, इसलिए गलत व्यक्ति उसके सामने आएगा तो अपना चेहरा ठीक करने की कोशिश जरूर करेगा. कई बार लेखक को अपने लिखे का तत्काल असर नजर नहीं आता, लेकिन अगर सार्थक लेखन है, तो उसका असर जरूर होगा. भारतीय गायों की दुर्दशा पर मैंने जब उपन्यास लिखा ‘एक गाय की आत्मकथा’ तो उसे पढ़कर एक मुस्लिम युवक मो. फैज़ खान ने सरकारी नौकरी छोड़ी और अब वह देशभर में घूम-घूम कर गौ जागरण का काम कर रहा है. मनोरंजन के लिए साहित्य लिखना मेरा लक्ष्य नहीं रहा. यह और बात है कि आज से तीन चार दशक पहले कवि सम्मेलनों के मंचों पर भी गया, वहाँ के लिए मैंने कुछ हास्य रचनाएँ ज़रूर की लेकिन फिर मंच का मोह त्याग दिया, और गंभीर व्यंग्य लेखन की ओर बढ़ गया,जो अब तक गतिमान है.
आपने चालीस वर्षों से अधिक समय तक साहित्य, पत्रकारिता और सामाजिक जीवन में निरंतर सक्रिय रहकर अनेक पीढ़ियों को प्रभावित किया। पीछे मुड़कर देखते हैं तो किस उपलब्धि पर सबसे अधिक संतोष होता है—पुरस्कारों पर, पुस्तकों पर, पाठकों पर या अपने सिद्धांतों पर?
आपके प्रश्न का उत्तर इस क्रम से दूंगा : पहले नंबर पर सिद्धांत, फिर पुस्तक,फिर अनेक पाठक और चौथे नंबर पर पुरस्कार. अपने जीवन में मिली ये तमाम उपलब्धियां मुझे संतोष प्रदान करती हैं कि मैं सही रास्ते पर चलता रहा. मैं रायपुर में बैठकर लेखन कर रहा हूँ और देश के अनेक भागों में बैठे लोग मेरे साहित्य पर शोध कर रहे हैं. दिल्ली का हिंदी भवन फोन करके मुझे ‘व्यंग्यश्री’ सम्मान देने की घोषणा कर रहा है जबकि मैंने कोई प्रविष्टि नहीं भेजी. मेरा अपना मानना है कि आप काम करते रहें. आपके काम को देखने वाली नज़रें एक न एक दिन आपकी अनुशंसा जरूर करती हैं. मैं ऐसा ही सौभाग्यशाली रहा.

आपके जीवन का वह सबसे कठिन दौर कौन-सा था, जब परिस्थितियों ने आपको तोड़ने की कोशिश की, लेकिन लेखनी ने आपको संभाल लिया?
सौभाग्य मेरे जीवन में ऐसी कोई स्थिति नहीं आई जिसने मुझे तोड़ने की कोशिश की. मैंने अपने जीवन में अनेक नौकरियां खुद छोड़ी. एक छोड़ी और दूसरी प्राप्त की.ज्यादातर मीडिया में ही रहा. कह सकता हूं कि लेखन ने मुझे हर समय संभालने की कोशिश की. मेरी अपनी ही लाइन है मैंने अपने ऊपर लागू की. जैसे मैंने मेरा एक शेर है हो मुसीबत लाख पर यह ध्यान रखना तुम मन को भीतर से बहुत बलवान रखना तुम फिर मैं गजल कहानी आपकी शुभकामनाएं साथ हैं क्या हुआ अगर कुछ बनाए साथ हैं हारने का अर्थ यह भी जानिए जीत की संभावनाएं साथ है और यह भी देखें आज नहीं तो कल मिलता है हर मेहनत का फल मिलता है. अनेक रचनाओं ने मुझे खुद हौसला दिया को लोगों ने तो ग्रहण किया मैंने भी अपनी रचनाओं से बहुत कुछ ग्रहण किया.
अंत में, यदि गिरीश पंकज जी अपनी पूरी जीवन-यात्रा का एक संदेश आने वाली पीढ़ी के लिए छोड़ना चाहें, तो वह क्या होगा? ऐसा कौन-सा जीवन-सूत्र है जिसे आप चाहते हैं कि हर युवा अपने हृदय में हमेशा के लिए संजो ले?
यही संदेश दूँगा कि अतीत का लिखा हुआ श्रेष्ठ साहित्य का अवगाहन करें और अपने सृजन के केंद्र में समाज कल्याण की भावना रखें. जोड़-तोड़ किए बगैर आगे बढ़े. ऐसे सम्मानों से बचें जो खरीदे जाते हों.
क्या आपकी कोई ऐसी निजी रुचि भी है, जिससे अधिकांश पाठक आज भी अनजान हैं?
कर्णप्रिय पुराने गानों को सुनना.
आज की राजनीति पर एक साहित्यकार की दृष्टि क्या कहती है? क्या आपको लगता है कि राजनीति में संवेदनशीलता और संवाद की संस्कृति पहले की तुलना में कमज़ोर हुई है, या समय के साथ उसका स्वरूप मात्र बदला है?
राजनीति में सर्वाधिक पतन हुआ है एक दौर था, जब राजनीति में सही मायने में जन नेता हुआ करते थे. जैसे डॉक्टर राममनोहर लोहिया, जयप्रकाश नारायण, दीनदयाल उपाध्याय आदि. और भी कुछ नाम हो सकते हैं. लेकिन अब वैसे तेजस्वी नेता नहीं रहे. पहले समाजवादी हुआ करते थे अब पूँजीवादी नेता दिखाई देते हैं. समय के साथ राजनीति का स्वरूप ही नहीं, चरित्र ही बदल गया है.
वे कौन-से लेखक, कवि, व्यंग्यकार और राजनेता हैं, जिनके विचारों, व्यक्तित्व या कार्यशैली ने आपको सबसे अधिक प्रभावित किया?
इसकी सूची काफी लंबी है फिर भी कुछ नाम है ले सकता हूं. महात्मा गांधी,विनोबा भावे, आचार्य नरेंद्र देव, लोहिया, जेपी के साथ ही साहित्यकारों में निराला, मैथिलीशरण गुप्त, माखनलाल चतुर्वेदी सोहनलाल द्विवेदी, गयाप्रसाद शुक्ल स्नेही, रामनरेश त्रिपाठी, महादेवी वर्मा, सुभद्रा कुमारी चौहान, दुष्यंत, अदम गोंडवी इत्यादि.
यदि ईश्वर आपको एक दिन का अवसर दें कि आप इतिहास के किसी एक लेखक, एक कवि और एक राजनेता के साथ बैठकर खुलकर संवाद कर सकें, तो आप किन तीन व्यक्तित्वों का चयन करेंगे? और उनसे वह कौन-सा एक प्रश्न पूछना चाहेंगे, जिसका उत्तर आज भी आपको बेचैन करता है?
मैं तीन लोगों का चयन करूंगा: महात्मा गांधी, डॉक्टर लोहिया और माखनलाल चतुर्वेदी. सबसे पहले में महात्मा गांधी से मिलकर उनसे पूछूंगा कि आपने अति उदारता के नाम पर एक विशेष पक्ष का ही हमेशा समर्थन क्यों किया? राजनेता डॉक्टर राममनोहर लोहिया से मिलकर पूछता कि आखिर इस देश में लोकतंत्र और समाजवाद क्यों सफल हो गया? महान साहित्यकार माखनलाल चतुर्वेदी से पूछता कि इस देश में अब राष्ट्रप्रेम क्यों खत्म हो रहा है?









