मैं यह मानती हूँ कि यदि जिम्मेदारियों को दृष्टिकोण, योजना और संवाद के माध्यम से समन्वित किया जाए, तो समाज और राष्ट्र दोनों के लिए सकारात्मक परिणाम हासिल करना संभव है।

वर्णिका शर्मा
अध्यक्ष
छत्तीसगढ़ राज्य बाल अधिकार
संरक्षण आयोग

वर्णिका शर्मा से गुरबीर सिंघ चावला की विशेष बातचीत
राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग की अध्यक्षता और राष्ट्रीय सुरक्षा जागरण मंच की राष्ट्रीय महामंत्री इन दो प्रमुख जिम्मेदारियों को आप कैसे संतुलित करती हैं?
राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग की अध्यक्षता और राष्ट्रीय सुरक्षा जागरण मंच की राष्ट्रीय महामंत्री के रूप में मेरी जिम्मेदारियाँ भले ही भिन्न क्षेत्रों से जुड़ी हों, परंतु मूल उद्देश्य समान हैं समाज के कमजोर वर्गों की सुरक्षा और राष्ट्र की समग्र भलाई। बाल अधिकारों का संरक्षण और समाज में सुरक्षा जागरूकता दोनों ही सामाजिक स्थिरता और राष्ट्रीय विकास के लिए अनिवार्य हैं।
इन दोनों भूमिकाओं को संतुलित करने के लिए मैं स्पष्ट प्राथमिकताएँ तय करती हूँ और समय प्रबंधन का अत्यधिक ध्यान रखती हूँ। आयोग में बच्चों के मामलों की संवेदनशीलता और त्वरित संज्ञान सुनिश्चित करना मेरी प्रमुख प्राथमिकता है, वहीं राष्ट्रीय सुरक्षा जागरण मंच के माध्यम से व्यापक स्तर पर सुरक्षा, जागरूकता और नागरिक सहभागिता को बढ़ावा देना मेरा उद्देश्य है।
इसके अतिरिक्त, दोनों संस्थाओं में मेरे साथ कार्यरत टीमों का सहयोग और समन्वय इस संतुलन को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। मैं यह मानती हूँ कि यदि जिम्मेदारियों को दृष्टिकोण, योजना और संवाद के माध्यम से समन्वित किया जाए, तो समाज और राष्ट्र दोनों के लिए सकारात्मक परिणाम हासिल करना संभव है।
यह संतुलन केवल प्रबंधन की तकनीक नहीं, बल्कि एक सामाजिक दायित्व और प्रतिबद्धता है, जिसे परिणामोन्मुख और संवेदनशील दृष्टिकोण के साथ निभाया जाता है।

आपका शोध “जनजातीय क्षेत्र में माओवादी संघर्ष के विविध आयाम” पर केंद्रित है। इस विषय को आप आम जनता तक कैसे पहुँचाना चाहती हैं?
मेरा शोध “जनजातीय क्षेत्र में माओवादी संघर्ष के विविध आयाम” केवल एक अकादमिक अध्ययन नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य जमीनी वास्तविकताओं और सामाजिक प्रभावों को व्यापक स्तर पर समझाना है। मैं चाहती हूँ कि यह विषय आम जनता तक पहुँचें ताकि लोग केवल हिंसा या सुरक्षा की दृष्टि से न देखें, बल्कि इसके पीछे की सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक जटिलताओं को भी समझें।
इसके लिए मैं शोध के निष्कर्षों को सरल, संवादात्मक और व्यावहारिक रूप में प्रस्तुत करने पर जोर देती हूँ। मीडिया में लेख, जन-जागरूकता कार्यक्रम, सार्वजनिक व्याख्यान और सामाजिक मंचों के माध्यम से यह जानकारी साझा की जाती है। साथ ही, स्थानीय समुदायों और प्रशासन के साथ कार्यशालाएँ आयोजित करके भी इसे वास्तविक जीवन की समस्याओं और उनके समाधानों से जोड़ने का प्रयास करती हूँ।
मेरा मानना है कि जब जनता माओवादी संघर्ष की जड़ें, प्रभावित समुदायों की कठिनाइयाँ और सुरक्षा-सुधार की दिशा को समझती है, तो समाज और प्रशासन दोनों मिलकर अधिक स्थायी और प्रभावी समाधान खोज सकते हैं। इस प्रकार, मेरा शोध न केवल अकादमिक मूल्य रखता है, बल्कि समाज में समझ और परिवर्तन लाने का माध्यम भी है।
माओवाद-प्रभावित क्षेत्रों में सुरक्षा बलों और स्थानीय लोगों के बीच विश्वास निर्माण के लिए आपके अनुसार सबसे प्रभावी उपाय क्या हैं?
माओवाद-प्रभावित क्षेत्रों में सुरक्षा बलों और स्थानीय लोगों के बीच विश्वास निर्माण केवल कानून या शक्ति के माध्यम से संभव नहीं है। मेरा अनुभव यह दर्शाता है कि स्थायी और प्रभावी समाधान के लिए संवाद, पारदर्शिता और सहभागिता सबसे महत्वपूर्ण उपाय हैं।
सबसे पहले, सुरक्षा बलों को स्थानीय समाज की सांस्कृतिक, सामाजिक और आर्थिक वास्तविकताओं को समझना चाहिए। समुदाय की समस्याओं और चिंताओं को सुनना, उनकी आवश्यकताओं के अनुरूप समाधान प्रस्तुत करना और उनकी भागीदारी सुनिश्चित करना विश्वास निर्माण का पहला कदम है।
दूसरा, विकास और सुरक्षा का समन्वित मॉडल अपनाना अत्यंत प्रभावी है। जैसे सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य, संचार और रोजगार के क्षेत्रों में सुधार और पहुँच बढ़ाना, स्थानीय लोगों में यह विश्वास जगाता है कि प्रशासन और सुरक्षा बल उनके जीवन में सुधार के लिए सक्रिय हैं।
तीसरा, सामुदायिक पुलिसिंग, संवाद-शिविर और प्रशिक्षण कार्यक्रमों के माध्यम से सुरक्षा बलों और समुदाय के बीच नियमित संपर्क और सहयोग स्थापित करना आवश्यक है। जब लोग देखेंगे कि सुरक्षा बल न केवल संरक्षण देने के लिए हैं बल्कि उनके हित में काम कर रहे हैं, तो विश्वास स्वाभाविक रूप से विकसित होता है।

आपने 35 शोध पत्र और तीन संपादकीय पुस्तकें लिखी हैं। इस व्यापक लेखन कार्य के पीछे आपका मुख्य प्रेरणा स्रोत क्या है?
मेरे लेखन का मुख्य प्रेरणा स्रोत हमेशा समाज और मानवता के प्रति मेरी जिम्मेदारी रही है। मैंने महसूस किया कि केवल अनुभव और कार्यों तक सीमित रहना पर्याप्त नहीं है। ज्ञान, शोध और विचारों को संरक्षित करना और साझा करना अत्यंत आवश्यक है। इसी सोच ने मुझे 35 शोध पत्र और तीन संपादकीय पुस्तकें लिखने के लिए प्रेरित किया।
मेरे लेखन का उद्देश्य केवल अकादमिक उपलब्धि हासिल करना नहीं है, बल्कि जमीनी वास्तविकताओं, सामाजिक समस्याओं और नीति निर्माण के दृष्टिकोण को लोगों तक पहुँचाना भी है। जब हम अपने अनुभव, शोध और निष्कर्षों को साझा करते हैं, तो वह केवल व्यक्तिगत ज्ञान नहीं रहता, बल्कि समाज और भविष्य की पीढ़ियों के लिए मार्गदर्शन का साधन बन जाता है।
साथ ही, यह लेखन मुझे यह अवसर देता है कि मैं बाल अधिकारों, मानवाधिकार, सुरक्षा और समाजिक जागरूकता जैसे संवेदनशील विषयों पर लोगों के दृष्टिकोण को प्रभावित कर सकूँ और उनके लिए व्यवहारिक समाधान सुझा सकूँ। इसलिए मेरे लिए लेखन केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी और परिवर्तन लाने का एक सशक्त उपकरण है।
चंदखुरी पुलिस प्रशिक्षण अकादमी में आप किस प्रकार के प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करती हैं और उनका उद्देश्य क्या है?
चंदखुरी पुलिस प्रशिक्षण अकादमी में मैं प्रशिक्षण कार्यक्रमों को केवल कानून या तकनीकी कौशल तक सीमित नहीं रखती, बल्कि उनमें मानव व्यवहार, नेतृत्व विकास और सामुदायिक जुड़ाव पर विशेष ध्यान दिया जाता है। इनमें मुख्य रूप से नेतृत्व विकास, तनाव प्रबंधन, मानव मनोविज्ञान, सामुदायिक पुलिसिंग और संघर्ष-संवेदनशीलता जैसे विषय शामिल हैं।
इन कार्यक्रमों का उद्देश्य पुलिस बल को केवल कानून लागू करने वाला तंत्र नहीं बनाना है, बल्कि उन्हें समाज का संवेदनशील, उत्तरदायी और भरोसेमंद संरक्षक बनाना है। प्रशिक्षण के दौरान अधिकारियों को यह समझाया जाता है कि जब वे स्थानीय समुदाय की वास्तविकताओं और भावनाओं को समझते हुए कार्य करेंगे, तभी कानून का पालन प्रभावी और स्थायी हो सकता है।
साथ ही, यह प्रशिक्षण पुलिस कर्मियों में निर्णय-निर्माण की स्पष्टता, अनुशासन और चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में शांत रहकर समाधान निकालने की क्षमता भी विकसित करता है। इस प्रकार, चंदखुरी अकादमी में आयोजित प्रशिक्षण कार्यक्रम समाज और पुलिस के बीच विश्वास और सहयोग को मजबूत करने के साथ-साथ पुलिस बल की पेशेवर दक्षता और मानव-केंद्रित दृष्टिकोण को बढ़ावा देने का कार्य करते हैं।

मानव प्रबंधन तकनीक को संघर्ष-ग्रस्त क्षेत्रों में लागू करने के आपके अनुभवों से क्या मुख्य सीख मिली?
संघर्ष-ग्रस्त क्षेत्रों में मानव प्रबंधन तकनीक को लागू करने के मेरे अनुभवों ने मुझे यह स्पष्ट रूप से सिखाया कि किसी भी चुनौतीपूर्ण परिस्थिति में केवल सुरक्षा या नियम-कानून पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है। सबसे प्रभावी परिणाम तब मिलते हैं जब मानव मनोविज्ञान, संवाद और विश्वास निर्माण को प्राथमिकता दी जाती है।
मैंने देखा कि स्थानीय समुदाय की भावनाओं, चिंताओं और सामाजिक संरचनाओं को समझना संघर्ष समाधान की प्रक्रिया में निर्णायक भूमिका निभाता है। समस्या के समाधान के लिए लोगों के दृष्टिकोण को शामिल करना, उनकी भागीदारी सुनिश्चित करना और उनके साथ नियमित संवाद बनाए रखना अत्यंत प्रभावी उपाय हैं। साथ ही, यह अनुभव यह भी सिखाता है कि धैर्य, संवेदनशीलता और नैतिक दृष्टिकोण के बिना किसी भी नीति या योजना को लागू करना स्थायी परिणाम नहीं देता। मानव प्रबंधन तकनीक के माध्यम से न केवल लोगों में विश्वास और सहभागिता बढ़ती है, बल्कि सुरक्षा बलों और प्रशासन के प्रयासों की प्रभावशीलता भी सुदृढ़ होती है। संक्षेप में, मेरी मुख्य सीख यही रही कि संवाद, समझ और सहयोग ही संघर्ष-ग्रस्त क्षेत्रों में स्थायी समाधान का आधार हैं, और यही दृष्टिकोण किसी भी सामाजिक या सुरक्षा चुनौती से निपटने में सबसे कारगर साबित होता है।
इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया में आपके 178 और 139 उल्लेखों ने आपकी सार्वजनिक छवि को कैसे प्रभावित किया?
इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में 178 और प्रिंट मीडिया में 139 उल्लेखों ने मेरी सार्वजनिक छवि को व्यापक रूप से स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यह केवल व्यक्तिगत मान्यता का विषय नहीं है, बल्कि मेरे द्वारा किए जा रहे सामाजिक कार्यों, बाल अधिकार संरक्षण और सुरक्षा जागरूकता प्रयासों की लोगों तक पहुँच सुनिश्चित करने का माध्यम भी है।
मीडिया में लगातार उपस्थिति ने मेरी जिम्मेदारी और दायित्व को और अधिक स्पष्ट कर दिया है। मुझे यह महसूस हुआ कि अब मेरी हर टिप्पणी, निर्णय या पहल जनता और समाज के लिए मार्गदर्शक बन सकती है। इसलिए मैं यह सुनिश्चित करती हूँ कि मीडिया में प्रस्तुत संदेश सटीक, तथ्यपरक और समाजहित में हो।
साथ ही, मीडिया के माध्यम से प्राप्त यह मान्यता न केवल मेरी पहचान को सुदृढ़ करती है, बल्कि मेरे कार्यों को और अधिक प्रभावी बनाने और समाज में सकारात्मक बदलाव लाने के लिए प्रेरणा भी देती है। इस अनुभव ने मुझे यह भी सिखाया कि सार्वजनिक छवि केवल व्यक्तित्व का प्रतिबिंब नहीं, बल्कि जिम्मेदार नेतृत्व और सामाजिक प्रतिबद्धता का प्रतीक भी होती है।

आप निरंतर सामाजिक सरोकारों पर संपादकीय लेख लिखती हैं। वर्तमान में कौन सा मुद्दा आपके लिए सबसे अधिक ज्वलंत है?
मेरे लिए वर्तमान समय में सबसे ज्वलंत और संवेदनशील मुद्दा बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा, साइबर अपराध, बाल तस्करी और बच्चों के लिए पर्याप्त खेल के मैदान एवं स्वस्थ मनोरंजन की कमी है। डिजिटल तकनीक ने जहां बच्चों के लिए शिक्षा और जानकारी के नए अवसर खोले हैं, वहीं इसके साथ उनका शोषण और जोखिम के नए रूप भी उत्पन्न हुए हैं।
इसके अतिरिक्त, बच्चों के लिए सुरक्षित और विकसित होने के साधन जैसे खेल के मैदान, खुले स्थान और सामुदायिक गतिविधियाँ बहुत सीमित हैं। यह न केवल उनके शारीरिक विकास और मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित करता है, बल्कि उन्हें गलत सामाजिक प्रभावों और डिजिटल दुनिया के जोखिमों के प्रति अधिक संवेदनशील बनाता है।
मेरे संपादकीय लेखों का उद्देश्य केवल जागरूकता फैलाना नहीं है, बल्कि समाज, अभिभावकों और नीति निर्माताओं को यह समझाना भी है कि बच्चों के लिए संतुलित और सुरक्षित वातावरण सुनिश्चित करना आवश्यक है। डिजिटल सुरक्षा उपायों के साथ-साथ खेल, मनोरंजन और खुले वातावरण की उपलब्धता बच्चों के समग्र विकास के लिए अनिवार्य है।
इसलिए मेरा प्रयास रहता है कि यह मुद्दा समाज और प्रशासन के ध्यान में आए, ताकि सुरक्षा, शिक्षा और खेल-कूद के अवसरों के बीच संतुलन बनाए रखते हुए बच्चों के अधिकारों और कल्याण की रक्षा की जा सके।
आपके द्वारा संकलित पुस्तक का मुख्य संदेश क्या है और आप इसे किन पाठकों के लिए लिखना चाहती थीं?
मेरी संकलित पुस्तक का मुख्य संदेश यही है कि किसी भी समाज की स्थायी शांति, सुरक्षा और प्रगति तब संभव है जब सुरक्षा, विकास और मानवाधिकार के बीच संतुलन स्थापित किया जाए, विशेषकर बच्चों के अधिकारों और उनके संरक्षण के मामले में। केवल सुरक्षा उपाय अपनाना या केवल विकास योजनाएँ लागू करना पर्याप्त नहीं है बल्कि बच्चों और समाज के कमजोर वर्गों के अधिकारों की रक्षा किए बिना कोई भी नीति पूर्ण नहीं मानी जा सकती।
इस पुस्तक को मैंने मुख्यतः शोधकर्ताओं, नीति-निर्माताओं, सुरक्षाबलों और जागरूक नागरिकों के लिए लिखा है। मेरा उद्देश्य था कि यह पुस्तक केवल अकादमिक अध्ययन न रहे, बल्कि इसे पढ़ने वाले लोग बच्चों की सुरक्षा और उनके विकास को ध्यान में रखते हुए समाज की समस्याओं को समझें, नीति निर्माण में योगदान दें और स्थानीय समुदायों के लिए स्थायी समाधान खोजें।
साथ ही, पुस्तक में बच्चों के सुरक्षित वातावरण, शिक्षा, खेल-कूद और डिजिटल सुरक्षा जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों को भी शामिल किया गया है। मेरा प्रयास रहा कि यह संकलन समाज में जागरूकता पैदा करे और बच्चों के अधिकारों और कल्याण की रक्षा के लिए ठोस और व्यावहारिक मार्गदर्शन प्रदान करे।
सैन्य मनोविज्ञान के अध्ययन ने आपके नेतृत्व शैली को किस प्रकार आकार दिया?
सैन्य मनोविज्ञान के अध्ययन ने मेरी नेतृत्व शैली को अत्यधिक व्यावहारिक, अनुशासित और निर्णयोन्मुख बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। संकटपूर्ण परिस्थितियों में शांत, स्पष्ट और निर्णायक रहने की क्षमता मेरे इस अध्ययन से विकसित हुई है।
मैंने देखा है कि किसी भी चुनौतीपूर्ण स्थिति में केवल तात्कालिक निर्णय लेना पर्याप्त नहीं होता, बल्कि यह महत्वपूर्ण है कि निर्णय संगठित सोच, मानसिक स्थिरता और मानव-सम्मान के दृष्टिकोण से संतुलित हो। सैन्य मनोविज्ञान ने मुझे यह सिखाया कि नेतृत्व केवल आदेश देने का नाम नहीं, बल्कि टीम के भीतर विश्वास, सहयोग और मानसिक सुदृढ़ता विकसित करने का नाम है।
इस अध्ययन ने मुझे यह भी समझाया कि संकट प्रबंधन और रणनीतिक योजना में मानवीय पहलुओं को समझना अत्यंत आवश्यक है। इसका प्रभाव मेरे आयोग और सामाजिक कार्यों में स्पष्ट दिखाई देता है, जहाँ मैं न केवल नीतियों को लागू करती हूँ, बल्कि उनके परिणामों का मानवीय दृष्टिकोण से मूल्यांकन भी करती हूँ।
संक्षेप में, सैन्य मनोविज्ञान ने मेरी नेतृत्व शैली को संतुलित, परिणामोन्मुख और संवेदनशील बनाने में योगदान दिया है, जिससे मैं जटिल परिस्थितियों में भी प्रभावी और न्यायसंगत निर्णय ले पाती हूँ।
राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठियों में मुख्य वक्ता के रूप में आपका सबसे यादगार क्षण कौन सा रहा?
जब अंतर्राष्ट्रीय मंच पर भारतीय आंतरिक सुरक्षा और संघर्ष प्रबंधन मॉडल की सराहना हुई, वह क्षण मेरे लिए अत्यंत गौरवपूर्ण और अविस्मरणीय रहा। उस समय यह अनुभूति हुई कि भारत द्वारा अपनाया गया समन्वित, मानवीय और विकास-केन्द्रित दृष्टिकोण वैश्विक स्तर पर भी स्वीकार्यता प्राप्त कर रहा है। एक भारतीय प्रतिनिधि के रूप में अपने देश के अनुभवों और प्रयासों को विश्व समुदाय के समक्ष प्रस्तुत करना तथा उनकी सकारात्मक प्रतिक्रिया प्राप्त करना मेरे लिए प्रेरणा का बड़ा स्रोत रहा, जिसने भविष्य में और अधिक प्रतिबद्धता के साथ कार्य करने का संबल दिया।
युवा शोधकर्ताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं को आप किस सलाह से प्रेरित करेंगी?
मैं युवाओं से यही कहना चाहूँगी कि वे बहुविषयक दृष्टिकोण अपनाएँ और अपने ज्ञान को केवल पुस्तकों तक सीमित न रखें, बल्कि जमीनी वास्तविकताओं से गहराई से जुड़ें। समाज, प्रशासन और मानव व्यवहार को समझे बिना किसी भी क्षेत्र में सार्थक योगदान संभव नहीं है। साथ ही, धैर्य और नैतिकता को अपने जीवन व कार्य का आधार बनाए रखें, क्योंकि दीर्घकालिक सफलता और विश्वसनीय नेतृत्व इन्हीं मूल्यों से निर्मित होता है।
छत्तीसगढ़ राज्य बाल संरक्षण आयोग की अध्यक्ष के रूप में आपकी प्रमुख उपलब्धियाँ क्या रही हैं?
छत्तीसगढ़ राज्य बाल संरक्षण आयोग की अध्यक्ष के रूप में मेरी प्रमुख उपलब्धियों में सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि बाल अधिकारों के संरक्षण हेतु “रक्षक” पाठ्यक्रम की परिकल्पना और उसका सफल शुभारंभ रहा है। यह पाठ्यक्रम बच्चों की सुरक्षा को लेकर संवेदनशील, प्रशिक्षित और उत्तरदायी मानव संसाधन तैयार करने की दिशा में एक ठोस और दूरदर्शी पहल है।
“रक्षक” पाठ्यक्रम का उद्देश्य पुलिस, प्रशासन, सामाजिक संगठनों और जमीनी स्तर पर कार्यरत कर्मियों को बाल अधिकार कानूनों, बाल संरक्षण प्रक्रियाओं, आपात हस्तक्षेप, साइबर सुरक्षा, बाल तस्करी और यौन शोषण से जुड़े मामलों में व्यवहारिक एवं मानवीय दृष्टिकोण से प्रशिक्षित करना है। इससे बाल संरक्षण तंत्र को अधिक प्रभावी और जवाबदेह बनाया जा सका है।
इसके साथ ही त्वरित संज्ञान प्रणाली, जिला-स्तरीय निगरानी तंत्र की मजबूती, बाल गृहों का नियमित निरीक्षण, तथा बाल अधिकारों पर व्यापक जन-जागरूकता अभियानों को सुदृढ़ करना भी मेरी प्रमुख उपलब्धियों में शामिल रहा है।
मेरा निरंतर प्रयास रहा है कि आयोग की कार्यप्रणाली केवल प्रतिक्रिया तक सीमित न रहकर निवारक, संवेदनशील और परिणामोन्मुख बने। मेरा दृढ़ विश्वास है कि “रक्षक” जैसे प्रशिक्षण कार्यक्रम बच्चों के लिए एक सुरक्षित वर्तमान और सशक्त भविष्य की नींव रखते हैं, और इसी उद्देश्य के साथ मैं बाल अधिकार संरक्षण के कार्य को आगे बढ़ा रही हूँ।
छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय के व्यक्तित्व की किन विशेषताओं से आप प्रभावित हैं?
उनकी सादगी और जन-सुलभ व्यक्तित्व उन्हें आमजन से सहज रूप से जोड़ता है। निर्णय-निर्माण में उनकी स्पष्टता और दृढ़ता शासन को दिशा देती है, वहीं आदिवासी समाज के प्रति उनका संवेदनशील और समावेशी दृष्टिकोण छत्तीसगढ़ की आत्मा को समझने की उनकी गहरी क्षमता को दर्शाता है। वे नीतियों को केवल कागजों तक सीमित नहीं रखते, बल्कि उन्हें जमीनी स्तर तक प्रभावी ढंग से पहुँचाने का प्रयास करते हैं, और यही गुण मुझे विशेष रूप से प्रभावित करता है।
छत्तीसगढ़ को नक्सल-मुक्त राज्य बनाने में सरकार के प्रयास कितने सफल हो पाए हैं?
सरकार द्वारा अपनाए गए समन्वित सुरक्षा-विकास मॉडल के परिणामस्वरूप छत्तीसगढ़ में नक्सल प्रभाव में स्पष्ट और उल्लेखनीय कमी देखने को मिली है। सुरक्षा बलों की सुदृढ़ एवं रणनीतिक उपस्थिति के साथ-साथ विकास योजनाओं की प्रभावी पहुँच ने उन क्षेत्रों में विश्वास का वातावरण बनाया है, जो लंबे समय तक हिंसा और उपेक्षा से प्रभावित रहे। सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य, संचार और रोजगार से जुड़े प्रयासों ने स्थानीय समुदायों को मुख्यधारा से जोड़ने में अहम भूमिका निभाई है। आज यह स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि छत्तीसगढ़ न केवल नक्सल चुनौती का सामना कर रहा है, बल्कि उसे निर्णायक रूप से परास्त करने की दिशा में मजबूती से आगे बढ़ रहा है।









